इंदौर में लॉरेंस के नाम की दहशत—सिस्टम की चुप्पी और व्यापारियों का डर।

स्वर्णिम भारत NEWS इंदौर। क्या देश का सबसे स्वच्छ शहर अब अपराध के साये में है? 
बीते कुछ महीनों से इंदौर के गलियारों में एक नाम की गूँज सुनाई दे रही है लॉरेंस बिश्नोई शहर के प्रतिष्ठित व्यापारियों, डॉक्टरों और शिक्षण संस्थानों के संचालकों को रंगदारी के लिए धमकियां मिल रही हैं। सवाल यह नहीं है कि धमकी कौन दे रहा है, सवाल यह है कि इस खौफ के खिलाफ सत्ता के गलियारों में सन्नाटा क्यों है?
सत्ता और संगठन की रहस्यमयी चुप्पी
हैरानी की बात यह है कि इंदौर जैसे संवेदनशील और व्यावसायिक केंद्र में लॉरेंस गैंग के नाम पर करोड़ों की फिरौती मांगी जा रही है, लेकिन राजनीतिक नेतृत्व मौन है।
 क्या भाजपा नगर अध्यक्ष, स्थानीय विधायक और सांसदों की ओर से कोई कड़ा बयान नहीं आना चाहिए?
 क्या गुर्गों को चेतावनी देने के लिए एक राजनैतिक इच्छाशक्ति की कमी है?
 जनता पूछ रही है कि क्या अपराधी इतने रसूखदार हो गए हैं कि जिम्मेदार पदों पर बैठे लोग उनका नाम लेने से भी कतरा रहे हैं?
   गृहमंत्री और मुख्यमंत्री की दोहरी भूमिका
प्रदेश के मुखिया डॉ. मोहन यादव न केवल मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं, बल्कि वे इंदौर के प्रभारी मंत्री और वर्तमान में गृहमंत्री भी हैं। इंदौर से उनका गहरा जुड़ाव है और वे अक्सर शहर के प्रवास पर रहते हैं। बावजूद इसके, इस बढ़ते 'गैंगस्टर कल्चर' पर उनकी ओर से किसी सार्वजनिक आश्वासन या सख्त कार्रवाई के निर्देश का इंतजार है।
                           बड़ा सवाल: क्या पुलिस की 10-12 गिरफ्तारियां काफी हैं? 
या फिर ये गिरफ्तारियां महज एक बड़े हिमशैल (Iceberg) का सिरा भर हैं? देश या प्रदेश में कौन इन्हें ऑपरेट कर रहा है? इसकी सच्चाई तो पुलिस इनसे उगलवाकर जनता को बता ही सकती है?

पुलिस की तफ्तीश और अनसुलझे पहलू
पुलिस का दावा है कि खरगोन और अन्य जिलों से कई शार्प शूटर पकड़े गए हैं। लेकिन असली मास्टरमाइंड कौन है?
 क्या ये वाकई लॉरेंस के गुर्गे हैं या उसके नाम का इस्तेमाल करने वाला कोई स्थानीय नेटवर्क?
 जब लॉरेंस अहमदाबाद की जेल में है और उसका भाई अनमोल बिश्नोई जांच एजेंसियों की रडार पर है, तो इंदौर पुलिस ने अब तक उनसे सीधा संपर्क कर इस नेटवर्क को ध्वस्त करने की योजना क्यों नहीं बनाई?
  भरोसे की कमी?
इंदौर का व्यापारिक जगत आज खुद को असुरक्षित महसूस कर रहा है। केवल पुलिस जांच के भरोसे इतने बड़े नेटवर्क का सामना नहीं किया जा सकता। इसके लिए राजनैतिक संकल्प की आवश्यकता है। 
अगर सरकार और प्रशासन ने जल्द ही कोई ठोस कदम नहीं उठाया और जनता के बीच भरोसा कायम नहीं किया, तो यह आगाज' किसी बड़े अंजाम' में बदल सकता है। क्या उस दिन का इंतजार कर रहा है सिस्टम और शहर? 
समय की मांग है कि जिम्मेदार लोग सामने आएं और इस दहशतगर्दी के खिलाफ दहाड़ें, न कि खामोश रहकर इसे फलने-फूलने का मौका दें।



                                                                   







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